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चीन ने 23वां नेवीगेशन सैटेलाइट प्रक्षेपित किया

दक्षिण पश्चिम चीन के सिचुआन प्रांत में कल शिचांग उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र (बीडीएस) से बईदोउ नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (बीडीएस) के 23वें उपग्रह का प्रक्षेपण किया गया।
•    लांग मार्च-3सी रॉकेट द्वारा उपग्रह को कक्षा में पहुंचाया गया। लांग मार्च रॉकेट का यह 229वां प्रक्षेपण था। 
•    बीडीएस उपग्रह प्रणाली का विकास अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) के विकल्प के तौर पर किया गया है।
•    उपग्रह अपने कक्षा में पहुंचने और इन-ऑर्बिट परीक्षण के बाद कक्षा में पहले से मौजूद 22 दूसरे उपग्रहों के समूह का हिस्सा बन जाएगा और प्रणाली की स्थिरता सुधारेगा जिससे बीडीएस वैश्विक दायरे में सेवा देने में सक्षम होगा।
•    बेईदोउ नेविगेशन उपग्रह प्रणाली को अमेरिका के जीपीएस के विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है. 
•    यह उपग्रह अपनी कक्षा में पहुंचने के पश्चात् इस क्षेत्र में कार्यरत अन्य उपग्रहों के साथ मिलकर कार्य करेगा. 
•    इससे इस प्रणाली में सशक्तता एवं वैश्विक मानदंडों के अनुसार स्थापित किये जाने को बल प्राप्त होगा.

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नासा ने दुनिया के सबसे बड़े उपग्रह का प्रक्षेपण किया

11 जून को एक नए अमरीकी जासूसी उपग्रह को कक्षा में डाला गया ।
•    एनआरओएल 37  को फ्लोरिडा के केप कैनवेरल एयर फ़ोर्स स्टेशन से प्रक्षेपित किया गया
•    एनआरओ अमेरिका के सभी जासूसी उपग्रहों की डिज़ाइन करता है
•    नैशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन  या जिसे संक्षेप में नासा कहते है, संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार की शाखा है जो देश के सार्वजनिक अंतरिक्ष कार्यक्रमों व एरोनॉटिक्स व एरोस्पेस संशोधन के लिए जिम्मेदार है। 
•    फ़रवरी 2006 से नासा का लक्ष्य वाक्य "भविष्य में अंतरिक्ष अन्वेषण, वैज्ञानिक खोज और एरोनॉटिक्स संशोधन को बढ़ाना" है।
•    उन्होंने एक नए स्पेस लॉन्च सिस्टम के डिज़ाइन का चुनाव किया है जिसके चलते संस्था के अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में और दूर तक सफर करने में सक्षम होंगे और अमेरिका द्वारा मानव अंतरिक्ष अन्वेषण में एक नया कदम साबित होंगे।
•    संस्था लॉन्च सेवा कार्यक्रम (एलएसपी) के लिए भी जिम्मेदार है जो लॉन्च कार्यों व नासा के मानवरहित लॉन्चों कि उलटी गिनती पर ध्यान रखता है।

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नासा ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में सफलतापूर्वक फैलने वाला एक कमरा भेजा

नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा ) ने सफलतापूर्वक अपनी पहली प्रयोगात्मक फैलने योग्य कमरे को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस ) में तैनात किया है ।
•    प्रयोगात्मक फैलने वाले कमरे को बीम (बिगेलो विस्तार गतिविधि मॉड्यूल) नाम दिया गया है 
•    इस कमरे (बीम) को नेवादा कंपनी बिगेलो एयरोस्पेस द्वारा बनाया गया है। 
•    यह एक दो साल के परीक्षण के लिए आईएसएस से जुड़ी होगी .
•    यह एल्यूमीनियम और मुलायम कपड़े जो से बना है । 
•    इसका वजन भी बहुत कम होता है और जगह भी कम लेता है । 
•    पूरी तरह से विस्तार होने पर यह 4 मीटर लंबा और 16 घन मीटर के साथ व्यास में 3.2 मीटर की दूरी तक फ़ैल जाता है 
•    नैशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार की शाखा है जो देश के सार्वजनिक अंतरिक्ष कार्यक्रमों व एरोनॉटिक्स व एरोस्पेस संशोधन के लिए जिम्मेदार है। 
•    वर्तमान में नासा अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को समर्थन दे रही है और ओरायन बहु-उपयोगी कर्मीदल वाहन व व्यापारिक कर्मीदल वाहन के निर्माण व विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही है। 
•    संस्था लॉन्च सेवा कार्यक्रम (एलएसपी) के लिए भी जिम्मेदार है जो लॉन्च कार्यों व नासा के मानवरहित लॉन्चों कि उलटी गिनती पर ध्यान रखता है।

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चीन प्रक्षेपित करेगा पहला क्वांटम संचार उपग्रह

चीन जुलाई महीने में अपना पहला प्रायोगिक क्वांटम संचार उपग्रह प्रक्षेपित करेगा। 
•    यह ऐसा उपग्रह है, जिससे होने वाले संप्रेषणों को न तो अवरुद्ध किया जा सकेगा और न ही इससे जानकारी हासिल की जा सकेगी। 
•    यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ऑफ चाइना के प्रोफेसर पैन जियानवेई ने बताया कि क्वांटम संप्रेषण की खासियत इसकी बेहद उच्च स्तरीय सुरक्षा है, क्योंकि क्वांटम फोटॉन को न तो अलग किया जा सकता है और न ही इसकी प्रतिकृति बनाई जा सकती है।
•    चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंस की परियोजना में उपग्रह का प्रक्षेपण और क्वांटम संप्रेषण के लिए जमीन पर चार स्टेशन व एक स्पेस क्वांटम टेलीपोर्टेशन एक्सपेरीमेंट स्टेशन का निर्माण शामिल है।
•    सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कहा कि परियोजना के पूरे हो जाने पर उपग्रह जमीन पर स्थित दो स्टेशनों के साथ एक ही समय में क्वांटम ऑप्टिकल संपर्क स्थापित कर पाएगा। 
•    पहला क्वांटम उपग्रह विकसित करने और उसका निर्माण करने में पांच साल लगे हैं। इसे जून में जियुक्वान उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र में भेज दिया जाएगा।

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इसरो ने हवा को इंधन के तौर पर इस्तेमाल करने वाले रॉकेट का परीक्षण शुरू किया

एक दोबारा इस्तेमाल किये जाने वाले प्रक्षेपण यान के सफलतापूर्वक परीक्षण के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक ऐसे राकेट के परिक्षण की तैयारी कर रहा है जो हवा से अपने इंधन की जरूरत पूरी करेगा .
•    तरल ऑक्सीजन का इस्तेमाल अब तक इंधन के तौर पर होता आया है .
•    प्लानिंग है की यान हवा को भीतर खिंचकर उसे द्रव्य में बदल कर उसे इंधन की तरह इस्तेमाल करे 
•    नई प्रणाली, के तहत लम्बी दूरी तक इसी मैकेनिज्म को इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है . इससे न सिर्फ वातावरण को फायदा होगा बल्कि प्रक्षेपण की कीमत भी गिरेगी 
•    इससे पहले राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी ने एक ही मिशन में कई उपग्रहों भेज सकने वाले राकेट का अविष्कार किया था 
•    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय कर्नाटक प्रान्त की राजधानी बेंगालुरू में है। 
•    संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। 
•    संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। 
•    अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।

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भारत का पहला पुनः प्रयोग किया जाने वाला स्पेस शटल आरएलवी-टीडी लॉन्च

•    भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 23 मई 2016 को पुनः प्रयोग हो सकने वाला स्वदेशी स्पेस शटल (आरएलवी-टीडी) श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) से लांच किया.
•    इसे सॉलिड राकेट मोटर (एसआरएम) द्वारा ले जाया गया. नौ टन के एसआरएम का डिजाईन इस प्रकार से बनाया गया है जिससे यह धीरे-धीरे घर्षण को सहन करता है.
•    शटल को लॉन्च करने के बाद व्हीकल को बंगाल की खाड़ी में बने वर्चुअल रनवे पर लौटाने का फैसला किया गया. 
•    सॉलिड फ्यूल वाला स्पेशल बूस्टर इसकी फर्स्ट स्टेज रही. ये आरएलवी-टीडी को 70 किमी तक ले गई. इसके बाद आरएलवी-टीडी को बंगाल की खाड़ी में नेविगेट करा लिया गया. 
•    यह स्पेस शटल रियूजेबल लॉन्च व्हीकल-टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर (RLV-TD) से लॉन्च होगा. 
•    6.5 मीटर लंबे हवाई जहाज की तरह दिखने वाले स्पेसक्राफ्ट का वजन 1.75 टन है.
•    इस परियोजना की लागत 95 करोड़ रूपये है. यह अमेरिका के स्पेस शटल जैसा ही है.
•    आरएलवी-टीडी के जिस मॉडल का प्रयोग किया जाएगा, वह इसके अंतिम रूप से 6 गुना छोटा है. आरएलवी-टीडी का अंतिम रूप बनने में 10-15 साल का समय लगेगा.
•    इसका निर्माण थिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में 600 वैज्ञानिकों की टीम द्वारा पांच वर्ष में किया गया.

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चीन का रिमोट सेंसिंग उपग्रह याओगान -30 प्रक्षेपित

चीन ने 15 मई को 10 बजकर 43 मिनट पर लांच मार्च रॉकेट के जरिये याओगान 30 रिमोट सेंसिंग उपग्रह प्रक्षेपित किया ।

•    यह उपग्रह मुख्य तौर पर वैज्ञानिक प्रयोग, भूमि संसाधन सर्वेक्षण, ग्रामीण उत्पादों का मूल्यांकन तथा आपदा निवारण जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जाएगा ।
•    नम्बर 30 रिमोट सेंसिंग उपग्रह और इसका प्रक्षेपण करने वाला रॉकेट चीन के तुंगफांगहूंग उपग्रह लिमिटेड कंपनी और शांघाई अंतरिक्ष उड्डयन अनुसंधानशाला द्वारा उत्पादित किये गये हैं ।
•    लांग मार्च-2डी रॉकेट के जरिए याओगान-30 को ले जाया गया।
•    यह चीन के लांच मार्च रॉकेट शृंखला द्वारा किया गया 227वां प्रक्षेपण है ।
•    चीन ने वर्ष 2006 में याओगान श्रृंखला का प्रथम उपग्रह प्रक्षेपित किया था।
•    अब तक इस श्रंखला के 29 उपग्रह छोड़े जा चुके हैं.
•    चीन इन उपग्रहों के माध्यम से न सिर्फ अपनी ज़मीन सुरक्षित रखना चाहता है बल्कि कई संसाधनों के उत्पाद और किसी तरह के आपदा को रोकने का काम कर रही है .

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वैज्ञानिकों ने पहली बार मंगल ग्रह के वातावरण में ऑक्सीजन ढूंढ़ निकाला है।

•    चार दशक पहले इसके कुछ संकेत मिले थे।
•    हालांकि ऑक्सीजन की जो मात्रा पाई गई है, वह उम्मीद से आधी है। 
•    इस खोज में वैज्ञानिकों ने स्ट्राटोफेरिक ऑब्जरवेटरी फॉर इन्फ्रारेड एस्ट्रोनॉमी (सोफिया) मशीन का प्रयोग किया था। 
•    सोफिया की मदद से वह लाल ग्रह के पर्यावरण की विविधता का अध्ययन आगे भी जारी रखेंगे।
•    सोफिया अभियान से जुड़ी वैज्ञानिक पामेला मैरकम के मुताबिक, मंगल के पर्यावरण में आणविक ऑक्सीजन को मापना काफी मुश्किल काम है। 
•    मैरकम ने कहा कि ग्रह पर इन्फ्रारेड तंरगों का पता लगाने के लिए भी परमाणुओं का पता लगाना जरूरी है और सोफिया के द्वारा यह संभव है। 
•    इसकी मदद से अंतरिक्ष वैज्ञानिक लाल ग्रह पर मौजूद ऑक्सीजन और धरती पर मौजूद ऑक्सीजन में आसानी से अंतर कर पाते हैं। 
•    सोफिया अभियान अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और जर्मनी के अंतरिक्ष केंद्र का संयुक्त अभियान है। इसमें 100 इंच के व्यास का टेलीस्कोप लगा है।
•    ग्रह पर 95 फीसदी कार्बन डाईऑक्साइड और तीन फीसदी नाइट्रोजन है, जो जीवन की संभावना के लिए मुफीद नहीं है। 
•    1970 के दशक में द वाइकिंग और मारीनर अभियान ने भी मंगल ग्रह के पर्यावरण में मौजूद परमाणु ऑक्सीजन का आकलन किया था।

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वैज्ञानिकों ने पहली बार मंगल ग्रह के वातावरण में ऑक्सीजन ढूंढ़ निकाला है।

•    चार दशक पहले इसके कुछ संकेत मिले थे।
•    हालांकि ऑक्सीजन की जो मात्रा पाई गई है, वह उम्मीद से आधी है। 
•    इस खोज में वैज्ञानिकों ने स्ट्राटोफेरिक ऑब्जरवेटरी फॉर इन्फ्रारेड एस्ट्रोनॉमी (सोफिया) मशीन का प्रयोग किया था। 
•    सोफिया की मदद से वह लाल ग्रह के पर्यावरण की विविधता का अध्ययन आगे भी जारी रखेंगे।
•    सोफिया अभियान से जुड़ी वैज्ञानिक पामेला मैरकम के मुताबिक, मंगल के पर्यावरण में आणविक ऑक्सीजन को मापना काफी मुश्किल काम है। 
•    मैरकम ने कहा कि ग्रह पर इन्फ्रारेड तंरगों का पता लगाने के लिए भी परमाणुओं का पता लगाना जरूरी है और सोफिया के द्वारा यह संभव है। 
•    इसकी मदद से अंतरिक्ष वैज्ञानिक लाल ग्रह पर मौजूद ऑक्सीजन और धरती पर मौजूद ऑक्सीजन में आसानी से अंतर कर पाते हैं। 
•    सोफिया अभियान अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और जर्मनी के अंतरिक्ष केंद्र का संयुक्त अभियान है। इसमें 100 इंच के व्यास का टेलीस्कोप लगा है।
•    ग्रह पर 95 फीसदी कार्बन डाईऑक्साइड और तीन फीसदी नाइट्रोजन है, जो जीवन की संभावना के लिए मुफीद नहीं है। 
•    1970 के दशक में द वाइकिंग और मारीनर अभियान ने भी मंगल ग्रह के पर्यावरण में मौजूद परमाणु ऑक्सीजन का आकलन किया था।

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रूस ने नए वोस्तोचिनी कोस्मोड्रोम से नए राकेट को लांच किया

रूस ने सुदूर पूर्व क्षेत्र चीन की सीमा के पास बने वोस्तोचिनी कोस्मोड्रोम से पहले रॉकेट का शुभारंभ किया गया ।

•    रॉकेट इसके साथ तीन उपग्रहों अर्थात् Mikhailo Lomonosov, Samsat -218 और Aist - 2 डी ले जा रहा है । 
•    वोस्तोचिनी कोस्मोड्रोम सिविल राकेट लांच करने के लिए बनी एक नयी लांच पैड है जो अभी भी निर्माणाधीन है 
•    वर्तमान में, रूस के पास बड़े सैन्य लांच की सुविधा है । 
•    लेकिन इसे प्रक्षेपण के लिए , अब भी बैकोनुर कोस्मोड्रोम  पर निर्भर रहना पड़ता है । 
•    नई कोस्मोड्रोम अपनी खुद की जमीन से सबसे मिशन शुरू करने के लिए रूस सक्षम करने के लिए जा रहा है। 
•    वर्तमान में, रूस के पास अपना कोई भी अलुन्चिंग पैड न होने हुए भी दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य शस्त्र लांच करने वाला देश है 

•    वोस्तोचिनी कोस्मोड्रोम में सात लांच पैड इसं साल के अंत तक बनाए जाने की योजना है 

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