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    स्पेसक्राफ्ट 'जूनो' पांच साल का सफर पूरा कर जूपिटर ऑर्बिट में पहुंचा

    अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का स्पेसक्राफ्ट 'जूनो' पांच साल का लंबा सफर तय कर जूपिटर (बृहस्पति) की कक्षा में पहुंच गया है. जूनो के चीफ साइंटिस्ट स्कॉट बोल्टन के अनुसार यह नासा का सबसे मुश्किल काम था. यान ने 05 जुलाई 2016 रात 11 बजकर 53 मिनट पर (अंतरराष्ट्रीय समयानुसार तड़के तीन बजकर 53 मिनट पर) बृहस्पति की कक्षा में प्रवेश किया.
    मानवरहित अंतरिक्षयान जूनो पांच साल पहले फ्लोरिडा के केप केनवेराल से प्रक्षेपित किया गया.
    •    मानवरहित अंतरिक्षयान जूनो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा सौर मंडल के पाँचवे ग्रह, बृहस्पति, पर अध्ययन हेतु 5 अगस्त 2011 को पृथ्वी से छोड़ा गया एक अंतरिक्ष शोध यान है.
    •    जूनो टेनिस कोर्ट के आकार जैसा एक अंतरिक्ष यान है.
    •    इसका भार लगभग साढ़े तीन टन है.
    •    जूनो बृहस्पति के आस-पास ऐसी परिक्रमा कक्षा में स्थान लेगा जो इसे उस ग्रह के ध्रुवों के ऊपर से ले जाया करेगी.
    •    इस पर हाइड्रोजन धातु के रूप में मौजूद है.
    •    जूपिटर की कक्षा में पहुंचने के लिए जूनो ने 5 वर्षों में करीब 280 करोड़ किलोमीटर का सफर तय किया.
    •    जूनो यान की एवरेज स्पीड 38 हजार किलोमीटर प्रति घंटा है.
    •    लेकिन जूपिटर के करीब पहुंचने पर इसकी रफ्तार 2 लाख 66 हजार किलोमीटर प्रति घंटा हो जाएगी.
    •    नासा का यह जूनो स्पेसक्राफ्ट बृहस्पति ग्रह की बनावट, वहां के मौसम, चुंबकीय क्षेत्र की जानकारी पृथ्वी की ओर ट्रांसमिट करेगा.
    •    जूनो यह भी पता लगाने की कोशिश करेगा कि क्या गैस जायंट माने जाने वाले जूपिटर प्लैनेट की गैस की परत के नीचे कोई पथरीला केंद्र है या नहीं.
    •    फरवरी 2018 तक इस यान का ग्रह की खोज का अभियान पूरा होगा.
    •    फरवरी 2018 में, ग्रह की 37 परिक्रमाएँ पूरी होने पर इस यान को धीमा कर के बृहस्पति के वायुमंडल में घुसाकर ध्वस्त कर दिया जाएगा.
    •    वातावरण में आक्सीजन और हाइड्रोजन की मात्राओं का अध्ययन करके पानी की मात्रा का भी अंदाज़ा लगाने का प्रयास किया जाएगा.
    •    जूनो के सामने चुनौती बृहस्पति ग्रह के भयानक बादलों को घेरे हुए इसके विकिरण बेल्ट में सही दशा-दिशा में बने रहने की है.
    •    उल्लेखनीय है कि इस अभियान से 20 साल पहले 1996 में गेलेलियो मिशन को बृहस्पति ग्रह पर भेजा गया था.
    •    बृहस्पति (ज्यूपिटर) एक टाइम कैप्सूल की तरह है.
    •    बृहस्तपति यानी जूपिटर हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है.
    •    रोमन सभ्यता ने अपने देवता जूपिटर के नाम पर इसका नाम रखा.
    •    जूपिटर एक चौथाई हीलियम के साथ मुख्य रूप से हाईड्रोजन से बना हुआ है.
    •    बृहस्पति ग्रह का आकार 1300 पृथ्वियों के बराबर है. जबकि इसका वज़न पृथ्वी से 360 गुना ज्यादा है.
    •    यह कोई ज़मीन यानी सरफेस नहीं है, बल्कि ये मूल रूप से गैस से बना ग्रह है.
    •    ग्रह पर गैस की अधिकता की वजह से इसे 'गैस जायंट' भी कहा जाता है.
    •    यह चार गैसीय ग्रहों में (सैटर्न, यूरेनस, नेप्च्यून, जूपिटर) में सबसे बड़ा है.
    •    1 अरब डॉलर से अधिक लागत वाले इस अभियान का उद्देश्य बृहस्पति के विकिरण बेल्ट में प्रवेश करते हुए इस ग्रह का अध्ययन एवं विश्लेषण करना है.
    •    जूनो बृहस्पति के कोर का पता लगाने के लिए उसके चुंबकीय और गुरुत्वीय क्षेत्रों का नक्शा खींचेगा.
    •    साथ ही यह ग्रह की बनावट, तापमान और बादलों को भी मापेगा और पता लगाएगा कि कैसे इसकी चुंबकीय शक्ति वातावरण को प्रभावित करती है.
    •    इसका द्रव्यमान पृथ्वी की तुलना में 300 गुना अधिक है इसलिए इसका गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र अत्यंत प्रबल है.
    •    जिसके कारण यह इस पर मौजूद सभी सामग्रियों को धारण किए हुए है.
    •    इसके अध्ययन से हमारे सौर तंत्र के विकास के विषय में जानकारी मिल सकती है.

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    नासा ने न्यू होराइजन स्पेस मिशन को क्विपर बेल्ट तक बढ़ाया

    नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा)  क्विपर बेल्ट में गहरी जांच करने के लिए नए क्षितिज मिशन के लिए अपनी मंजूरी दे दी
    •    प्लूटो के पास से गुजरने की ऐतिहासिक सफलता मिलने के बाद नासा का न्यू होराइजन मिशन अंतरिक्ष की गहराइयों में उड़ान भरेगा। 
    •    यह मिशन अंतरिक्ष में उस प्राचीन पिंड की तरफ बढ़ेगा जिसे सौर प्रणाली निर्माण का शुरुआती ब्लॉक माना जाता है।
    •    कुइपर बेल्ट की गहराई में स्थित पिंड तक अंतरिक्ष यान 1 जनवरी 2019 पहुंच सकता है। यही इसका निर्धारित समय है। 
    •    कुइपर बेल्ट को 2014 एमयू69 के नाम से जाना जाता है। नासा के ग्रह विज्ञान निदेशक जिम ग्रीन ने कहा, 'प्लूटो के लिए न्यू होराइजन मिशन हमारे अनुमान से आगे निकल गया है और आज भी अंतरिक्ष यान के आंकड़े हैरत पैदा कर रहे हैं।'
    •    जुलाई 2016 के पहले सप्ताह में नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने एक रहस्यमय वस्तु क्विपर बेल्ट में गहरी जांच करने के लिए नए क्षितिज मिशन को अपनी मंजूरी दे दी है।
    •    इस मिशन में  2014 MU69 नामक वस्तु का पता लगाया  जाएगा।
    •    उम्मीद है कि नया क्षितिज 31 दिसम्बर 2018 या 1 जनवरी 2019 तक 2014 MU69 तक पहुंच जाएगा।
    •    2014 MU69 शुरू में क्रमश: नए क्षितिज और हबल टीमों द्वारा PT1 और 1110113Y के नाम से जाना जाता था ।
    •    2014 MU69 एक प्राचीन वस्तु और सौर प्रणाली के प्रारंभिक निर्माण ब्लॉकों में से एक माना जाता है।
    •    इसे अगस्त 2015 में नए क्षितिज 'लक्ष्य के रूप में चयनित किया गया था।
    •    अक्टूबर और नवंबर 2015 में चार बार रास्तों  में परिवर्तन करने के बाद, नया क्षितिज 2014 MU69 की राह पर है। 
    •    जिसकी खोज अंतरिक्ष यान लांच होने तक नहीं की जा सकी थी विज्ञान उसे सामने लाने में जुटा है।
    •    नए क्षितिज केप केनवरल एयर फोर्स स्टेशन से 19 जनवरी 2006 को शुरू किया गया था।
    •    14 जुलाई 2015, इसे प्लूटो की सतह से ऊपर 12500 किमी उड़ान भरी, 

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    चीन ने दूसरा शिजियन-16 सीरीज उपग्रह प्रक्षेपित किया

    चीन ने 29 जून 2016 को दूसरा शिजियन-16 सीरीज़ का उपग्रह प्रक्षेपित किया. यह उपग्रह लॉन्ग मार्च-4बी रॉकेट द्वारा जियुक्वान सेटेलाईट लॉन्च सेंटर से प्रक्षेपित किया गया. 
    •    शिजियन-16 उपग्रह अंतरिक्ष के वातावरण को मापने, विकिरण एवं उसके प्रभाव तथा प्रौद्योगिकी के परीक्षण के लिए उपयोग किया जाएगा.
    •    पहला शिजियन-16 उपग्रह अक्टूबर 2013 को प्रक्षेपित किया गया था.
    •    लॉन्ग मार्च रॉकेट की यह 231वीं उड़ान थी.  
    •    इसका उपयोग समकालिक कक्षा के मौसम उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए किया जाता है.
    •    पहली बार इसे मई 1999 में उपयोग किया गया. इसे शंघाई एकेडमी ऑफ़ स्पेस फ्लाइट टेक्नोलॉजी (एसएएसटी) द्वारा चांग जेंग-4 प्रणाली के आधार पर विकसित किया गया.
    •    यह 2800 किलोग्राम के उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है.
    •    इस रॉकेट का वजन 2,48,470 किलोग्राम है, इसकी लम्बाई 45.58 मीटर है तथा व्यास 3.35 मीटर है.

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    नासा का पावर बूस्टर रॉकेट मंगल यात्रा को तैयार

    अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा दुनिया का सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट मंगल पर भेजने की तैयारी में हैं, और उसने इस दिशा में उटाह के प्रोमोनटोरी में स्थित ऑर्बिटल एटीके के परीक्षण केंद्र में अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली (एसएलएस) के बूस्टर का सफल परीक्षण किया.

    •    यह नासा के ओरियन अंतरिक्ष यान के जरिए 2018 में प्रस्तावित पहले मानव विहीन परीक्षण उड़ान के लिए एसएलएस के तैयार होने से पूर्व बूस्टर का यह अंतिम व्यापक परीक्षण था. 
    •    वर्ष 2018 का प्रस्तावित परीक्षण नासा के मंगल मिशन में एक मील का पत्थर साबित होने वाला है.
    •    वाशिंगटन स्थित नासा मुख्यालय के ह्यूमन एक्सप्लोरेशन एंड ऑपरेशन्स मिशन डॉरेक्टोरेट के सह-प्रशासक विलियम गर्सटेनमेयर ने कहा, "बूस्टर प्रणाली की इस अंतिम योग्यता परीक्षण से अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली के विकास की वास्तविक प्रगति का पता चलता है."
    •    इस परीक्षण ने और लगभग 36 लाख पाउंड के खर्च मानव अन्वेषण की दिशा में प्रगति में मदद करता है और गहन अंतरिक्ष में विज्ञान व प्रौद्योगिकी मिशनों के लिए नए फलक खोलता है.
    •    दो मिनट के इस पूर्णकालिक परीक्षण ने नासा को 82 अहर्ता उद्देश्यों पर महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध कराया है, जो उड़ान के लिए बूस्टर के प्रमाणीकरण में मदद करेगा.
    •    इंजीनियर अब बूस्टर पर 530 से अधिक इंस्ट्रमेंटेशन चैनलों द्वारा एकत्र किए गए परीक्षण के आंकड़ों का मूल्यांकन करेंगे.

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    चीन ने भारत और नेपाल की सीमा पर ‘डार्क स्काई रिजर्व’ की शुरुआत की

    चीन ने भारत और नेपाल की सीमा से लगे अपने तिब्बती क्षेत्र में प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित करने और खगोलीय स्थलों को सुरक्षित रखने के मकसद से ‘डार्क स्काई रिजर्व’ की शुरुआत की है।
    •    यह डार्क स्काई रिजर्व 2,500 वर्गकिलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। 
    •    इसकी शुरुआत ‘चाइना बायोडाइवर्सिटी कंजरवेशन एंड ग्रीन डेवलपमेंट फाउंडेशन’ तथा तिब्बत की क्षेत्रीय सरकार की ओर से संयुक्त रूप से की गई है।
    •    फाउंडेशन के कानूनी मामलों के प्रमुख वांग वेनयोंग ने कहा कि इलाके को प्रकाश प्रदूषण से मुक्त रखने की दिशा में यह पहला कदम है।
    •    उन्होंने सरकारी अखबार ‘चाइना डेली’ से कहा कि अगर हम इलाके को सुरक्षित रखने के लिए अभी कदम नहीं उठाते तो हम पृथ्वी पर बेहतरीन खगोलीय स्थलों को खो देंगे।

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    इसरो ने श्रीहरिकोटा से 20 सेटेलाईट प्रक्षेपित करने का रिकॉर्ड बनाया

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा 22 जून 2016 को 17 विदेशी सेटेलाइटों सहित कुल 20 सेटेलाइट सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा से एक साथ प्रक्षेपित किये गये.
    •    इससे पहले इसरो ने वर्ष 2008 में एक साथ 10 सेटेलाईट प्रक्षेपित किये थे. 
    •    इनमें भारत के कारटोसैट—2 और भारतीय विश्वविद्यालयों के 2 सैटेलाइटों का प्रक्षेपण हुआ. साथ में 17 छोटे विदेशी सैटेलाइट भी भेजे गए. इन 20 सैटेलाइटों का कुल वजन 1,228 किलोग्राम है. 
    •    इन्हें पीएसएलवी सी-34 से छोड़ा गया. दूसरे देशों में अमेरिका, जर्मनी, कनाडा एवं इंडोनेशिया के सेटेलाईट शामिल हैं. जबकि दो सेटेलाईट सत्याबामा यूनिवर्सिटी एवं कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग, पुणे के लिए प्रक्षेपित किये गये.
    •    कारटोसैट—2 प्राइमरी श्रेणी का सेटेलाईट है जिसे पीएसएलवी-सी34 द्वारा छोड़ा गया. यह इससे पहले प्रक्षेपित किये गये कारटोसैट—2ए, एवं 2बी के ही समान है. कोर्टोसेट-2 उपग्रह और 19 अन्य उपग्रहों को 505 किलोमीटर की ऊंचाई पर सन सिनक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा.
    •    इन सेटेलाईटटों की सहायता से शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भेजी जाने वाली तस्वीरों से विभिन्न आयामों जैसे रोड नेटवर्क मॉनिटरिंग, जल वितरण, मानचित्र निर्माण एवं उपयोग, दिशा निर्देश एवं भूमि सूचना तंत्र में प्रभावशाली सहायता मिलेगी.
    •    लापान ए3 (इंडोनेशिया): यह छोटा उपग्रह पृथ्वी निगरानी और चुंबकीय क्षेत्र की निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जाएगा.
    •    बीरोस (जर्मनी): इसका उपयोग उच्च तापमान की घटनाओं में रिमोट सेंसिंग के लिए किया जायेगा.
    •    स्काईसैट जेन2-1 (अमेरिका): इसका उपयोग पृथ्वी की तस्वीरों हेतु किया जायेगा.
    •    समुद्री निगरानी और मैसेजिंग माइक्रोसेटेलाइट (कनाडा): इस सेटेलाईट का उपयोग पृथ्वी की निचली कक्षा से स्वचालित पहचान प्रणाली के लिए किया जायेगा.

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    मंगल ग्रह के गड्ढे का नाम नेपाल के भूकंप प्रभावित गांव लांगटांग के नाम पर रखा गया

    अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ ने जून 2016 में मंगल ग्रह पर मौजूद 9.8 किलोमीटर चौड़े एक गड्ढे का नाम नेपाल के भूकंप प्रभावित स्थान लांगटांग के नाम पर रखा.
    •    लांगटांग नेपाल का एक गांव है जो 25 अप्रैल 2015 को आये भीषण भूकंप के कारण तबाह हो गया था. 
    •    रिपोर्ट के अनुसार, इस गांव में भूकंप एवं उसके बाद आये भूस्खलन से 215 लोग मारे गये. 
    •    शोधकर्ता डॉ जालिंग डी हास के अनुसार उन्होंने यह नाम इसलिए चुना क्योंकि उनके साथी ने वहां रहकर हिमालय के ग्लेशियरों का अध्ययन किया था. 
    •    वहां उनका बेस कैंप था और हमें लगता है कि यह हमारी ओर से इस स्थान के लिए यह गहरी श्रद्धाजलि है.
    •    हास मंगल ग्रह के शारीरिक भूगोल पर उतरेच यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रहे हैं. 
    •    उन्होंने एक दुसरे गड्ढे का नाम अपने निवास स्थान उतरेच में मौजूद बुन्निक के नाम पर रखा.
    •    दोनों नामों को अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ कार्य समूह द्वारा अनुमोदित किया गया.

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    बृहस्पति की तरह दिखने वाले ग्रह केपलर-1647बी की खोज की गयी

    वैज्ञानिकों ने बृहस्पति की तरह दिखने वाले ग्रह केपलर-1647बी की खोज की है. दो सितारों की एक प्रणाली की परिक्रमा करता हुआ पाया गया जिसके कारण इसका अस्तित्व ब्रह्मांड में सबसे बड़ा हो सकता है.
    ग्रह केपलर-1647बी, नक्षत्र सिग्नस में स्थित है जिसे नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर और सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी के खगोलविदों द्वारा खोजा गया.
    खोजकर्ताओं के अनुसार केपलर-1647 लगभग 3700 प्रकाश वर्ष दूर है एवं यह 4.4 बिलियन वर्ष पुराना हो सकता है जो लगभग पृथ्वी के समान है.
    •    इसे नासा के स्पेस टेलीस्कोप केपलर द्वारा खोजा गया. इस उपकरण को वर्ष 2009 में हमारे सौर मंडल से दूर स्थित मौजूद ग्रहों का पता लगाने के लिए तैयार किया गया था.
    •    इससे पता चला कि इन तारों में एक सूर्य से बड़ा है तथा एक छोटा है.
    •    इस ग्रह का द्रव्यमान और त्रिज्या बृहस्पति के समान ही है जिसके कारण यह सबसे बड़े ग्रह होने का दावा करता है. जो ग्रह सितारों की परिक्रमा करते हैं उन्हें कुकुम्बरी ग्रह कहा जाता है.
    •    इसे दोनों सितारों का चक्कर पूरा करने में 1107 दिन लगते हैं जो कि किसी ग्रह द्वारा लगाया जाने वाला सबसे अधिक समय है.
    •    ग्रह की कक्षा तथाकथित रूप से आवासीय क्षेत्र हो सकता है जहां पानी की मौजूदगी को नाकारा नहीं जा सकता.
    •    ब्रहस्पति की तरह यह भी एक गैसीय ग्रह है.
    यह अध्ययन एस्ट्रोफिज़िकल नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया.

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    प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल को बाह्य अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग के लिए अंतरिक्ष विभाग/भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (डीओएस/इसरो) और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी (सीएसए) के बीच हस्‍ताक्षरित सहमति पत्र (एमओयू) के बारे में अवगत करा दिया गया है। 
    •    इस एमओयू पर 15 अप्रैल, 2015 को ओटावा, कनाडा में हस्‍ताक्षर किए गए थे। 
    •    इस एमओयू से एक संयुक्‍त टीम का गठन होगा, जिसमें इसरो और सीएसए के सदस्‍य शामिल होंगे। यह टीम सहयोगात्‍मक परियोजनाओं पर गौर करने एवं इन्‍हें परिभाषित करने सहित कार्ययोजना नये सिरे से तैयार करेगी और इसके साथ ही समय सीमा तय करेगी। 
    •    इससे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के शांतिपूर्ण उपयोग के क्षेत्र में विविध अनुसंधान के अवसर भी मिलेंगे। 
    •    सफल अंतरिक्ष सहयोग को एस्ट्रोसैट खगोल विज्ञान मिशन के समर्थन में उपग्रह ट्रैकिंग नेटवर्क परिचालन और अल्ट्रा वायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (यूवीआईटी) डिटेक्टर सबसिस्टम के क्षेत्र में लागू दो व्‍यवस्‍थाओं के जरिये क्रमशः दिसम्‍बर 2003 एवं जून 2004 से चलाया जा रहा है। 
    •    इसका उद्देश्‍य शांतिपूर्ण उपयोग के लिए बाह्य अंतरिक्ष में भावी सहयोग के साथ-साथ इसका उपयोग सुनिश्चित करना है, ताकि सरकारी, औद्योगिक एवं शैक्षणिक स्‍तरों पर दोनों देशों के बीच वैज्ञानिक व प्रौद्योगिकी विकास और आपसी संबंधों को सुदृढ़ किया जा सके। 

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    नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप ने यूजीसी 4879 नाम का एक रहस्यमय एकान्त और बौना आकाशगंगा खोजा

    नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप ने यूजीसी 4879 नाम का एक रहस्यमय एकान्त और बौना आकाशगंगा खोज निकाला है ।
    •    ये आकाशगंगा बहुत छोटा है 
    •    गैलेक्सी यूजीसी 4879 बहुत अलग है जिसमे सितारे बिखरे हुए होते हैं। 
    •    यह लगभग 2.3 लाख प्रकाश वर्ष दूर है 
    •    ये हमारे निकटम पड़ोसी एंड्रोमेडा आकाशगंगा और हमारी आकाशगंगा के बीच स्थित है।
    •    वैज्ञानिकों का मानना है की इस एकान्त आकाशगंगा यूजीसी 4879 के  अध्ययन से ब्रह्मांड भर में तारों की उत्पत्ति के जटिल रहस्यों को समझने में आसानी होगी।
    •    हबल टेलिस्कोप नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बीच एक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष परियोजना के सहयोग के रूप में 1990 में शुरू किया गया था
    •    हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी वास्तव में एक खगोलीय दूरदर्शी है जो अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थित है
    •    हबल दूरदर्शी को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ' नासा ' ने यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से तैयार किया था | 
    •    अमेरिकी खगोलविज्ञानी एडविन पोंवेल हबल के नाम पर इसे ' हबल ' नाम दिया गया |
    •    यह नासा की प्रमुख वेधशालाओं में से एक है |

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