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चीन ने परिवहन विमान वाई-20 को सेना में किया शामिल

चीन ने स्वेदश निर्मित अपने सबसे बड़े परिवहन विमान वाई-20 को सेना में शामिल कर लिया. 
•    यह सैन्य विमानन प्रोद्योगिकी पीएलए के लिए एक बड़ी उपलब्धि है जिससे दुनिया की सबसे बड़ी सेना अपने माल और सैनिकों को विभिन्न मौसमों में लंबी दूरी तक ले जा सकेगी.
•    वायुसेना के प्रवक्ता शेन जिंके ने कहा कि वाई-20 का सेवा में शामिल होना वायुसेना के लिए महत्वपूर्ण है जिससे इसकी समारिक शक्ति में सुधार होगा.
•    इस विमान का अधिकतम टेक-आफ वजन 200 टन का है. 
•    वाई-20 आधिकारिक तौर पर पीएलए वायु सेना में चेंगडू में शामिल हुआ है और यह विभिन्न मौसमों में सामान और कर्मियों को लंबी दूरी तक ले जाने के लिए आदर्श है.
•    चीनी वायुसेना को राष्ट्रीय सुरक्षा की हिफाजत करने के साथ ही साथ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बचाव और राहत कार्यों सहित अपनी सैन्य जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से पूरा करने के लिए और तथा बेहतर परिवहन की जरूरत है.
•    चीनी वायुसेना ने हाल के वषरें में आपदाएं आने पर पाकिस्तान, मंगोलिया, थाइलैंड, नेपाल तथा अन्य देशों को सहायता और राहत सामग्री प्रदान की है.
•    चीनी अधिकारियों ने कहा कि स्वदेश में डिजाइन और विकसित किए गए वाई-20 ने जनवरी 2013 में पहली उड़ान भरी थी और इसका प्रदर्शन पहली बार नवंबर 2014 में 10वीं चीन अंतरराष्ट्रीय विमानन अंतरिक्ष प्रदर्शनी में किया गया था.
•    इस विमान की तुलना रूस निर्मित आईएल-76 और अमेरिका निर्मित सी-17 से की जा रही है. पीएलए के अधिकारियों ने पहले कहा था कि वाई -20 आईएल 476 से अधिक उन्नत है.

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दुनिया के सबसे बड़े रेडियो टेलिस्कोप को चीन ने किया स्थापित

चीन ने दुनिया के सबसे बड़े रेडियो टेलिस्कोप (दूरबीन) के इन्स्टालेशन की प्रक्रिया पूरी कर ली है। 
•    यह टेलिस्कोप चीन के दक्षिण-पश्चिम प्रांत गुईझु में बनाया गया है।
•    यह 500 मीटर व्यास का अपर्चर स्फीयरिकल टेलिस्कोप इतना विशाल है कि 30 फुटबॉल पिचों को समा सकता है। 
•    इस टेलिस्कोप में 4450 त्रिकोणिय पैनलों को फिट किया गया है।•    इस टेलिस्कोप को पहाड़ियों की शृंखलाओं के बीच बनाया गया है। 
•    चीन के विज्ञान अकादमी के अंतर्गत आने वाले नेशनल ऐस्ट्रोनॉमिकल ऑबजरवेशन के डिप्टी हेड झेंग श्याओनियान ने कहा कि अब वैज्ञानिक इस रेडियो दूरबीन के ट्रायल की शुरुआत करेंगे।
•    झेंग ने कहा कि पृथ्वी के बाहर जीवन ढूँढने और अंतरिक्ष में अजीबोगरीब चीजों को ढूँढने व समझने के लिए चीन की यह परियोजना काफी उपयोग में आएगी। 
•    यह परियोजना 2011 में शुरू हुई थी।180 मिलियन डॉलर की लागत से बनी रेडियो टेलिस्कोप सितंबर तक पूर्णतया काम करनी शुरू कर देगी। 
•    अब चीन 2036 तक चाँद पर इंसान को भेजने की तैयारी में है और अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की भी उसकी मंशा है। 
•    इन परियोजनाओं पर काम शुरू हो चुका है।

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डायनासोर के समय के पंक्षियों के पंख म्यांमार में पाए गये

वैज्ञानिकों ने छोटे, प्रागैतिहासिक पक्षियों की पूरी पंख के नमूनों की खोज की है जो करीब 100 मिलियन साल पुराने हैं ।
•    डायनासोर के समय के जीवाश्म पक्षियों के हजारों नमूने चीन में पाया गया। 
•    हालांकि, इन जीवाश्मों के उपर चट्टान हैं जो इनकी रक्षा करते हैं.
•    नए नमूने, चीन के भूविज्ञान विश्वविद्यालय से जिंग लिडा, और ब्रिटेन में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय से माइक बेंटन सहित शोधकर्ताओं की टीम द्वारा खोज की गयी.
•    इसकी खोज पूर्वोत्तर म्यांमार में एक प्रसिद्ध जगह एम्बर में की गयी है जहाँ से कीड़ों के उत्तम नमूनों के हजारों उत्पादन किये गये है 
•    यह पहली बार है कि पक्षियों के पूरे भागों का उल्लेख किया गया है।
•    इससे पहले पंख वाले डायनासोर पछियों से भी पहले उड़ना सीख सकते थे। 
•    वैज्ञानिकों बताते हैं कि चीन में आसाधारण लंबे पंखों वाले एक डायनासोर के जीवाश्म का खोज किया गया है जो की डायनासोर के उड़ान के बारे में रोमांचक जानकरी प्रदान करता है।

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सीएसआईआर ने मधुमेह से लड़ने वाली आयुर्वेदिक दवा बीजीआर-34 को लॉन्च किया.

मधुमेह रोगियों के लिए खुशखबरी है. द काउंसिल फॉर साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) ने सोमवार को मधुमेह से लड़ने वाली आयुर्वेदिक दवा बीजीआर-34 को लॉन्च किया.
•    टाइप टू डायबिटीज से लड़ने के लिए बनाई गई बीजीआर-34 को लखनऊ स्थित नेशनल बॉटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनबीआरआई) और सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स (सीआईएमएपी) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है.
•    एनबीआरआई के वरिष्ठ प्रमुख वैज्ञानिक एकेएस रावत ने कहा, "मधुमेह के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आधुनिक दवाओं में  साइड-इफेक्ट्स और जहरीलाे पदार्थ होते हैं. जबकि बीजीआर-34 केवल ब्लड शुगर को नियंत्रित करने और अन्य हानिकारक दवाओं के दुष्प्रभावों को सीमित करने के काम आती है."
•    इसके लिए एनबीआरआई और सीआईएमएपी के वैज्ञानिकों ने आयुर्वेद में वर्णित करीब 500 प्राचीन जड़ी-बूटियों का अध्ययन किया. 
•    इनमें दरहरिद्र, गिलोय, विजयसर, गुड़मर, मजीठ और मेथिका को शामिल करके मधुमेह-रोधी दवा विकसित की है.

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वैज्ञानिकों ने जैव स्याही युक्त स्टेम सेल का निर्माण किया जिससे कोशिकाओं की थ्री डी प्रिंटिंग की जा सकेगी . अपने नए प्रिंटर की उपयोगिता को दर्शाने के लिए वैज्ञानिकों ने उसमे मानव शरीर के कुछ अंग जैसे निचला जबड़ा, मांसपेशियाँ, उपास्थि और कान आदि बनाए हैं जो बिलकुल असली अंगों जैसे लगते हैं|
•    स्टेम कोशिका या मूल कोशिका ऐसी कोशिकाएं होती हैं, जिनमें शरीर के किसी भी अंग को कोशिका के रूप में विकसित करने की क्षमता मिलती है। 
•    इसके साथ ही ये अन्य किसी भी प्रकार की कोशिकाओं में बदल सकती है।
•    वैज्ञानिकों के अनुसार इन कोशिकाओं को शरीर की किसी भी कोशिका की मरम्मत के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
•    इस प्रकार यदि हृदय की कोशिकाएं खराब हो गईं, तो इनकी मरम्मत स्टेम कोशिका द्वारा की जा सकती है। 
•    इसी प्रकार यदि आंख की कॉर्निया की कोशिकाएं खराब हो जायें, तो उन्हें भी स्टेम कोशिकाओं द्वाअ विकसित कर प्रत्यारोपित किया जा सकता है
•    स्टेम कोशिका उपचार एक प्रकार की हस्तक्षेप इलाज पद्धति है, जिसके तहत चोट अथवा विकार के उपचार हेतु क्षतिग्रस्त ऊतकों में नयी कोशिकायें प्रवेशित की जाती हैं।
•    कई चिकित्सीय शोधकर्ताओं का मानना है कि स्टेम कोशिका द्वारा उपचार में मानव विकारों का कायाकल्प कर पीड़ा हरने की क्षमता है।
•    स्टेम कोशिकाओं में, स्वंय पुनर्निर्मित होकर अलग-अलग स्तरों में आगामी नस्लों की योग्यताओं में आंशिक बदलाव के साथ निर्माण करने की क्षमता के चलते, ऊतकों को बनाने की महत्वपूर्ण खूबी तथा शरीर के विकार युक्त एवं क्षतिग्रस्त हिस्सों को अस्वीकरण होने के जोखिम एवं दुष्प्रभावों के बगैर बदलने की क्षमता है।

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चीन का सनवे तेहुलाइट दुनिया का सबसे तेज सुपर कंप्यूटर

चीन के एक नए कंप्यूटर सिस्टम को दुनिया का सबसे तेज सुपर कंप्यूटर आंका गया है। 
•    सुपर कंप्यूटर "सनवे तेहुलाइट" प्रति सेकेंड 930 लाख अरब गणनाएं करने में सक्षम है। 
•    इसे नेशनल रिसर्च सेंटर ऑफ पैरलल कंप्यूटर इंजीनियरिग एंड टेक्नोलॉजी ने तैयार किया है। इसे पूरी तरह से चीन निर्मित प्रोसेसरों की मदद से बनाया गया है।
•    इस सुपर कंप्यूटर को चीन के नेशनल सुपर कंप्यूटिंग सेंटर में रखा गया है। 
•    इसने इंटेल आधारित "तियानहे-2" को पछाड़ा है, जो टॉप 500 सुपर कंप्यूटरों की सूची में पिछले छह साल से नंबर एक पर था। यह सूची साल में दो बार जारी की जाती है।
•    "सनवे तेहुलाइट" "तियानहे-2" की तुलना में दोगुना तेज और तीन गुना ज्यादा क्षमता वाला है। 
•    "तियानहे-2" प्रति सेकेंड 338.6 लाख अरब गणनाएं करने में सक्षम है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग (डीओई) के ओक रिज नेशनल लैबोरेटरी में लगा "टाइटन" 175.9 लाख अरब गणना प्रति सेकेंड की क्षमता के साथ इस सूची में तीसरे नंबर पर है।
•    डीओई के लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लैबोरेटरी में लगे "सिक्यूओइया" और जापान के रिकेन एंडवांस्ड इंस्टीट्यूट फॉर कंप्यूटेशनल साइंस में लगे फुजित्सु के "के कंप्यूटर" को क्रमशः चौथे और पांचवे स्थान पर रखा गया है।

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नासा ने एक्स-57 हाइब्रिड इलेक्ट्रिक रिसर्च विमान लॉन्च किया

नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने 17 जून 2016 को एक्स-57 हाइब्रिड इलेक्ट्रिक रिसर्च विमान लॉन्च किया. इस विमान को ‘मैक्सवेल’ उपनाम दिया गया है.
•    इस विमान में प्रोपेलर के तौर पर 14 इलेक्ट्रिक मोटर लगी हैं तथा इसके पंख भी विशेष रूप से तैयार किये गये हैं. नासा इस विमान को नवीन प्रोपलज़न तकनीक के लिए प्रयोग करेगा.
•    इसका नाम 19वीं सदी के स्कॉटिश भौतिकी वैज्ञानिक जेम्स क्लर्क मैक्सवेल के नाम पर रखा गया. उन्होंने इलेक्ट्रो-मैगनेटिज्म में विशेष योगदान दिया.
•    एक कलाकार द्वारा तैयार डिजाईन में दिखाया गया है कि इसके पंखों में 14 इलेक्ट्रिक मोटर लगाई गयी हैं.
•    नासा के वैज्ञानिक मैक्सवेल द्वारा यह दर्शाएंगे कि किस प्रकार इलेक्ट्रिकन प्रोपलज़न द्वारा विमानों द्वारा होने वाले शोर को कम किया जा सकता है.
•    मैक्सवेल में केवल बैटरी द्वारा उर्जा प्रदान की जाएगी. इसमें कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है.
•    इससे यात्रियों के समय की बचत भी होगी क्योंकि इसमें प्रयोग होने वाले ईंधन (विद्युत्) के लिए जगह-जगह रुकना नहीं पड़ेगा. इससे उर्जा स्रोतों की भी बचत होगी.
•    नासा के इस प्रयोग से एक्स-57 से विमानन क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत हो सकती है.
•    वर्ष 1947 में एक्स सीरीज़ का पहला विमान एक्स-1 लाया गया जो ध्वनि की गति से तेज़ था. 
•    इसके बाद एक्स-1 परियोजना से अमेरिका की सैन्य जरूरतों, औद्योगिक क्षमताओं और अनुसंधान सुविधाओं तथा युद्ध के उपरांत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सहायता प्राप्त हुई.

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रूस द्वारा दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु आइसब्रेकर निर्मित अर्कतिका को लांच किया

रूस ने 16 जून 2016 को अपनी एक नई परियोजना 22220 परमाणु आइसब्रेकर “अकर्तिका” का शुभारंभ किया। इसे रूस के दूसरे सबसे बड़े शहर - यह सेंट पीटर्सबर्ग में बाल्टिक शिपयार्ड से शुरू किया गया ।
•    परियोजना 22220 विश्व में अपनी तरह का सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली पोत है और इसे रूस की यूनाइटेड शिपबिल्डिंग कॉरपोरेशन के बाल्टिक शिपयार्ड में बनाया गया है।
•    पोत 189.5 गज लंबा और 37.1 गज चौड़ा है।
•    यह 33540 मीट्रिक टन और दो विशेष रूप से डिजाइन परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के साथ फिट है।
•    यह पूरी तरह से आधुनिक रूस में निर्मित होने वाली पहली रूसी परमाणु आइसब्रेकर है।
•    यह आर्कटिक में लगभग लगभग 10 फीट तक की मोती बर्फ की पार्ट को तोड़ सकता है 
•    उस वक़्त रूसी उप प्रधानमंत्री सर्जे इवानोव ने कहा था कि रूस की सबसे बड़ी पोत निर्माता कंपनी, सोवकॉमफ्लोट में एक हिस्सेदारी बेचने से जो धन अर्जित होगा वह सरकारी खजाने में नहीं जाएगा, बल्कि उसे एक नई पीढ़ी का परमाणु संचालित आइसब्रेकर बनाने में खर्च किया जाएगा।
•    इवानोव ने कहा था की इस आइसब्रेकर का निर्माण कार्य पांच वर्षों में पूरा हो जाएगा। 
•    इसकी रफ्तार 37 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। 

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय कैबिनेट ने 15 जून 2016 को अंतरराष्ट्रीय महाद्वीपीय वैज्ञानिक ड्रिलिंग कार्यक्रम में भारत की सदस्यता को स्वीकृति दी.
•    हेल्महोल्ज़ सेंटर पोट्सडेम जीएफजेड जर्मन भू-विज्ञान अनुसंधान केन्द्र के साथ एक समझौता ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षर के द्वारा अंतरराष्ट्रीय महाद्वीपीय वैज्ञानिक ड्रिलिंग कार्यक्रम (आईसीडीपी) संघ में भारत की सदस्यता को स्वीकृति मिली. 
•    यह जर्मनी के ब्रांडेनबर्ग का एक सरकार द्वारा वितपोषित सार्वजनिक विधि संस्थान है.
•    सदस्यता समझौते के एक अंग के रूप में भारत दो आईसीडीपी पैनलों-कार्यकारी समिति (ईसी) और असेम्बली ऑफ गर्वंनर्स (एओजी) में एक सीट हासिल करेगा. 
•    इसके अलावा, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के द्वारा चलाई जा रही कोयना वैज्ञानिक गहरी खुदाई परियोजना के लिए कार्यशालाओं में मदद, आंकड़े प्रबंधन एवं प्रतिदर्ष जैसे प्रमुख वैज्ञानिक क्षेत्र में मानव श्रम परीक्षण के संदर्भ में आईसीडीपी क्षमता निर्माण संवर्धन के अलावा संचालनगत और तकनीकी सहायता प्रदान करेगा. 
•    आईसीडीपी के सदस्य के रूप में भारत के वैज्ञानिकों/अभियंताओं को आईसीडीपी की सभी सह-वित्त पोषित कार्यशालाओं और खुदाई परियोजनाओं में भागीदारी के लिए अपने प्रस्तावों को दाखिल करने का अधिकार होगा और वे आईसीडीपी परियोजना से मिलने वाले सभी आंकड़ों के परिणामों को प्राप्त कर सकेंगे. इससे भूकम्पीय और भूकम्प प्रक्रियाओं के लिए उन्नत समझ के स्तर पर कार्य किया जा सकेगा.
•    आईसीडीपी के साथ सदस्यता पर पांच वर्षों की अवधि के लिए समझौता ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षर करने से, भारत कोयना क्षेत्र से संबंधित अन्वीक्षण और गहरी खुदाई के संदर्भ में वैज्ञानिक खुदाई के विभिन्न पहलुओं के बारे में गहन विशेषज्ञता के साथ अंतरराष्ट्रीय रूप से ख्याति प्राप्त विशेज्ञषों के साथ मिलकर कार्य करने में समर्थ हो जाएगा
ब्रेंबल केय, जलवायु परिवर्तन से विलुप्त होने वाला पहला स्तनपायी जीव घोषित
वैज्ञानिकों ने जून 2016 को ग्रेट बैरियर रीफ में पाया जाने वाले ब्रेंबल केय नामक स्तनपायी जीव को विलुप्त घोषित किया.

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मानवीय कारणों के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन से यह पहला जीव है जिसे विलुप्त घोषित किया गया.

क्वीन्सलैंड के डिपार्टमेंट ऑफ़ एनवायरनमेंट एंड हेरिटेज के वैज्ञानिक इयान गायन्थर द्वारा किये गये सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी.
•    जीव के विलुप्त होने का मुख्य कारण उच्च ज्वार एवं समुद्र का बढ़ता जलस्तर है. यह जलस्तर द्वीप पर भी मौजूद रहने लगा जिससे जीव के निवास स्थान के लिए खतरा पैदा हो गया.
•    समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण बहुत से जीव जंतु मारे गये. 
•    इसे ऑस्ट्रेलियन ग्रेट बैरियर रीफ रोडेंट अथवा ब्रेंबल केय के नाम से भी जाना जाता है.
•    यह मुरिडे परिवार से जुड़ा एक जीव था.
•    यह केप यॉर्क मेलोम्यस जैसा दिखता था लेकिन इसमें कुछ आधारभूत प्रोटीन विभिन्नताए भी मजूद थीं.
•    यह अधिकतर मैदानी इलाकों में पाया जाता था एवं वनस्पति भोजन पर निर्भर रहने वाला जीव था.
•    यह ऑस्ट्रेलिया का अलग-थलग रहने वाला स्तनपायी जीव था.
•    पहली बार इसकी खोज अप्रैल 1845 में की गयी. उस समय इसकी जनसँख्या काफी अधिक थी.

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